मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले में जमीन अधिग्रहण और खनिज नीलामी का मुद्दा अब सियासी तकरार का बड़ा कारण बनता जा रहा है। जोबट विधायक सेना महेश पटेल ने प्रभावित आदिवासी किसानों के साथ बैठक कर उनकी समस्याएं सुनीं और साफ शब्दों में कहा कि आदिवासी समाज की जमीन की लड़ाई विधानसभा से लेकर सड़क तक लड़ी जाएगी।
जोबट विधायक कार्यालय के बाद चंद्रशेखर आजाद नगर के डाक बंगले में भी प्रभावित ग्रामीणों के साथ बैठक हुई। यहां किसानों ने खनिज नीलामी और जमीन से जुड़े अपने सवाल और चिंताएं विधायक के सामने रखीं।
सेना महेश पटेल ने कहा कि आदिवासी समाज के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं है, बल्कि उनकी पहचान, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। इसलिए जमीन से जुड़े किसी भी फैसले में ग्रामीणों की राय, उनके अधिकार और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है।
विधायक ने कहा कि खनिज नीलामी से प्रभावित किसानों की जमीन का मुद्दा आगामी विधानसभा सत्र में प्रमुखता से उठाया जाएगा। जरूरत पड़ी तो आदिवासी विधायकों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन की रणनीति भी तैयार की जाएगी।
सेना महेश पटेल ने दो टूक कहा कि आदिवासी समाज के पास पहले से ही सीमित जमीन है। ऐसे में जमीन से जुड़े किसी भी मामले में किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की एक इंच जमीन भी नहीं जाने देंगे और किसानों को डरने की जरूरत नहीं है।
विधायक ने सरकार से यह भी मांग की कि प्रभावित जमीन को लेकर लिखित में स्थिति स्पष्ट की जाए। उनका कहना है कि अगर कांग्रेस द्वारा उठाया जा रहा जमीन का मुद्दा गलत है तो सरकार लिखित रूप से बताए कि खनिज नीलामी से प्रभावित किसानों की जमीन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि सिर्फ कांग्रेस पर आरोप लगाने से ग्रामीणों की चिंता खत्म नहीं होगी। सरकार और प्रशासन को यह बताना होगा कि प्रभावित पंचायतों और किसानों की जमीन को लेकर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी और उनके अधिकारों की सुरक्षा कैसे होगी।
इसी बीच बीजेपी कार्यकर्ताओं के अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने और ज्ञापन को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश पटेल ने सवाल किया कि जब प्रदेश में बीजेपी की सरकार है, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं और नागर सिंह चौहान कैबिनेट मंत्री हैं, तो बीजेपी नेताओं को अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना देने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सरकार भी आपकी, मुख्यमंत्री भी आपके, मंत्री भी आपके और प्रशासन भी आपकी सरकार का है, तो फिर धरना किसके खिलाफ और ज्ञापन किसको दिया जा रहा है?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर किसी मंत्री को जिले को सूखाग्रस्त घोषित कराने या किसानों को राहत दिलाने की मांग करनी है तो उन्हें अपनी ही सरकार के सामने कैबिनेट में प्रस्ताव रखना चाहिए और मुख्यमंत्री से फैसला करवाना चाहिए।
महेश पटेल ने सवाल उठाया कि अगर एक कैबिनेट मंत्री को अपनी ही सरकार के सामने धरना देना पड़ रहा है, तो आम आदिवासी, किसान और गरीब की सुनवाई को लेकर क्या स्थिति होगी?
कांग्रेस नेताओं ने 25 अगस्त को बड़ी संख्या में ग्रामीणों के कलेक्टर कार्यालय पहुंचने का भी हवाला दिया। उनका कहना है कि ग्रामीण पहले ही प्रशासन के सामने अपनी जमीन और अधिकारों को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। इसलिए उनकी आवाज को महज राजनीतिक बयान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही विधायक सेना महेश पटेल ने आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े मामलों की जांच की मांग भी उठाई है। उन्होंने संदिग्ध परिस्थितियों में हुई जमीनों की खरीद-बिक्री और संबंधित दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की।
विधायक ने कहा कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस इस मामले को प्रशासन से लेकर न्यायालय तक ले जाएगी और किसानों के अधिकारों की कानूनी लड़ाई भी लड़ेगी।
अब इस पूरे मामले को लेकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि जल, जंगल और जमीन के सवाल पर वह पीछे हटने वाली नहीं है। आगामी विधानसभा सत्र में जमीन के स्वामित्व, खनिज नीलामी और प्रभावित गांवों के किसानों के अधिकारों का मुद्दा उठाने की तैयारी है।
अगर सरकार की ओर से ग्रामीणों की मांगों और जमीन से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब नहीं आता है, तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की चेतावनी भी दी गई है। यानी जोबट में जमीन का मुद्दा अब सिर्फ किसानों की चिंता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विधानसभा से लेकर सड़क तक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप लेता नजर आ रहा है।

