भोपाल। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो बताती है कि किसी इलाके से नक्सलवाद का प्रभाव खत्म होने के बाद वहां सरकारी सुविधाओं की पहुंच किस तरह लोगों की जिंदगी बदल सकती है। कभी नक्सल गतिविधियों का गढ़ रहे इस इलाके के कई गांवों में पहली बार स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार पहुंच रही हैं और घर-घर जाकर लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण कर रही हैं।
नक्सलवाद के दौर में स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर रहे गांव
बिरसा विकासखंड के बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा, कोरका, मछुरदा, मातला और गठिया जैसे गांव लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहे। बताया जाता है कि 1986 के आसपास यहां हथियारबंद नक्सली गतिविधियां बड़े स्तर पर शुरू हुई थीं। साल 1990 में बिरसा थाने में पहला नक्सल मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद कई हिंसक घटनाओं में सुरक्षाबलों और जनप्रतिनिधियों की जान गई।
इसी वजह से इन दूरदराज इलाकों में सरकारी सेवाओं की पहुंच भी प्रभावित हुई। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, कई ग्रामीण बीमारी की स्थिति में अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते थे और अनेक मामलों में बीमारी से मौत होने के बावजूद उसका कोई व्यवस्थित मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
2025 में नक्सल मुक्त हुआ बालाघाट का इलाका
सरकार के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विशेष अभियान के बाद 2025 में बालाघाट को नक्सल मुक्त घोषित किया गया। इसके बाद अब प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें उन इलाकों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही हैं, जहां लंबे समय तक सरकारी अमला नियमित रूप से नहीं पहुंच पाता था।
स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का भरोसा जीतना है। अधिकारियों के मुताबिक, लंबे समय तक चले नक्सली प्रभाव के कारण कुछ ग्रामीण अभी भी वर्दी देखकर डर जाते हैं और डॉक्टरों से इलाज कराने में हिचकिचाते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य टीमें घर-घर जाकर लोगों से संपर्क कर रही हैं और उन्हें समझा रही हैं कि बीमारी होने पर अस्पताल जाना जरूरी है।
एक बच्चे की मौत के बाद शुरू हुई बड़े स्तर पर जांच
इसी साल जून में इलाके में एक बच्चे की मौत का मामला सामने आया। बच्चे को तेज बुखार के साथ शरीर पर चकत्ते, मुंह में छाले, पेट दर्द, उल्टी-दस्त, भूख न लगना, कमजोरी और झटके जैसे लक्षण बताए गए। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने पूरे क्षेत्र में बीमारी की स्थिति को समझने के लिए घर-घर जाकर बच्चों की जांच शुरू की।
डॉक्टरों की टीमों ने गांवों में जाकर बच्चों की स्क्रीनिंग की। शुरुआत में यह काम आसान नहीं था, क्योंकि कुछ परिवार अपने बच्चों को लेकर डॉक्टरों से बचने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन लगातार संपर्क और समझाइश के बाद कई परिवारों ने बच्चों का इलाज करवाना शुरू किया।
169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया
स्वास्थ्य विभाग की जानकारी के मुताबिक, बिरसा विकासखंड के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका और बोंदारी समेत प्रभावित गांवों से कुल 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से 125 बच्चे इलाज के बाद स्वस्थ होकर अपने घर लौट चुके हैं, जबकि 44 बच्चों का इलाज जारी है और विभाग के अनुसार उनकी स्थिति स्वस्थ है।
इसके अलावा अलग-अलग बीमारियों से प्रभावित 461 मरीजों का इलाज उनके घर पर ही किया गया और उन्हें स्वस्थ किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब तक कुल 630 मरीजों की पहचान हुई है।
घर-घर पहुंच रही 20 सर्वेक्षण टीमें
स्वास्थ्य विभाग ने इन इलाकों में बड़े स्तर पर अभियान शुरू किया है। करीब 20 सर्वेक्षण टीमें घर-घर जाकर स्वास्थ्य परीक्षण कर रही हैं। इसके अलावा चार पीएम जनमन एएमएमयू, 10 चिकित्सा अधिकारी और चार एंबुलेंस भी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लगाए गए हैं।
टीमें बच्चों और ग्रामीणों में मौसमी बीमारी, बुखार, सर्दी-खांसी, त्वचा रोग, मीजल्स, स्कैबीज और मलेरिया जैसी बीमारियों की जांच और उपचार कर रही हैं।
658 बच्चों को विटामिन ए और 597 को आयरन सिरप दिया गया
स्वास्थ्य विभाग के सर्वे के दौरान 658 बच्चों को विटामिन ए की खुराक, ओआरएस और जिंक की गोलियां दी गईं। 597 बच्चों को आयरन सिरप दिया गया, जबकि 521 बच्चों को एल्बेंडाजोल की गोली खिलाई गई। वहीं 63 बच्चों को मीजल्स का टीका लगाया गया।
इसके साथ ही 10 गांवों के करीब 980 घरों में कीटनाशक छिड़काव, इंडोर और आउटडोर फॉगिंग तथा लार्वा सर्वे भी किया गया।
नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच
बालाघाट के बिरसा इलाके की यह तस्वीर सिर्फ स्वास्थ्य अभियान की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि लंबे समय तक हिंसा और अलगाव से प्रभावित इलाकों में सरकारी सेवाओं को पहुंचाने के लिए सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा जीतना भी जरूरी होता है।
125 बच्चों का इलाज के बाद स्वस्थ होकर अपने गांव लौटना प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हालांकि चुनौती अभी भी बड़ी है, क्योंकि दशकों से बने डर और अविश्वास को खत्म करने में समय लगेगा। लेकिन डॉक्टरों की टीमों का गांव-गांव पहुंचना इस दिशा में एक नई शुरुआत जरूर माना जा सकता है।

