भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने के प्रस्ताव ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। प्रस्ताव सामने आते ही कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गए हैं। एक ओर कांग्रेस इसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी व्यक्तित्व के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बता रही है, तो दूसरी ओर सरकार का कहना है कि अभी इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और प्रस्ताव शासन के पास आने के बाद ही विचार किया जाएगा।
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि मौलाना बरकतउल्ला देश के महान क्रांतिकारियों में से एक थे और उनके नाम को हटाने की कोशिश स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का अपमान है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वाग्देवी के नाम पर कोई नया संस्थान बनाना चाहती है तो उसका स्वागत किया जाएगा, लेकिन वर्षों पुरानी और स्थापित यूनिवर्सिटी का नाम बदलना उचित नहीं है।
आरिफ मसूद ने यह भी कहा कि इस मुद्दे को लेकर वे राज्यपाल से मुलाकात करेंगे और अपना पक्ष रखेंगे। साथ ही उन्होंने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के नाम में बदलाव की चर्चाओं पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि देश के लिए योगदान देने वाले नेताओं और क्रांतिकारियों के नामों का सम्मान किया जाना चाहिए।
वहीं भाजपा ने इस पूरे विवाद पर पलटवार करते हुए कहा है कि सरकार हमेशा जनता की भावनाओं के अनुरूप निर्णय लेती है। पार्टी का कहना है कि यदि समाज के बड़े वर्ग की ऐसी भावना है तो उस पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि संस्थानों के नाम इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े होते हैं।
मामले पर उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने स्पष्ट किया कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है और नाम परिवर्तन का प्रस्ताव उसकी कार्य परिषद की बैठक में पारित हुआ है। उन्होंने कहा कि फिलहाल यह प्रस्ताव शासन के पास नहीं पहुंचा है। जब प्रस्ताव सरकार के पास आएगा, तब उसका अध्ययन किया जाएगा और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।
इसी बीच इस पूरे विवाद में इतिहास भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। कुछ इतिहासकारों ने राजा भोज और मौलाना बरकतउल्ला के योगदान को लेकर अपनी-अपनी राय रखी है। इतिहासकार शाहनवाज खान का कहना है कि राजा भोज का मुख्य योगदान भोपाल क्षेत्र में बड़े तालाब के निर्माण से जुड़ा माना जाता है, जबकि मौलाना बरकतउल्ला का जन्म भोपाल में हुआ था और उन्होंने देश की आजादी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इतिहासकारों का मानना है कि दोनों व्यक्तित्वों का योगदान अपने-अपने संदर्भ में महत्वपूर्ण है और उनकी तुलना अलग-अलग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखी जानी चाहिए। अब इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला क्या होता है, इस पर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा जगत दोनों की नजरें टिकी हुई हैं।

