नर्मदापुरम। मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम में आदिवासी समाज का गुस्सा अब आंदोलन में बदल चुका है। वन विभाग और कुछ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगने के बाद इलाके में भारी तनाव का माहौल बन गया। आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया है कि लोगों को कई दिनों तक बंधक बनाकर मारपीट की गई, जातिसूचक गालियां दी गईं और यहां तक कि करंट लगाने जैसी अमानवीय हरकतें भी की गईं।
इन आरोपों के बाद वन विभाग के SDO Anil Vishwakarma पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आदिवासी संगठनों का कहना है कि पीड़ित पिछले डेढ़ महीने से एसपी और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटते रहे, लेकिन उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों हुई और क्या विभाग अपने अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रहा था?
जब न्याय की उम्मीद टूटने लगी तो आदिवासी समाज सड़क पर उतर आया। हजारों की संख्या में लोगों ने 24 घंटे का ऐतिहासिक धरना शुरू कर दिया, जिससे प्रशासन में हड़कंप मच गया। हालात बिगड़ते देख प्रभारी कलेक्टर हिमांशु जैन को खुद मौके पर पहुंचना पड़ा।
आदिवासी संगठनों और प्रशासन के बीच करीब 15 मिनट तक तीखी बातचीत हुई, जिसके बाद प्रशासन ने विशेष जांच टीम यानी SIT गठित करने का लिखित आश्वासन दिया। इसके बाद फिलहाल धरना समाप्त किया गया।
आदिवासी संगठन के संयोजक दुर्गेश धुर्वे ने इसे समाज की बड़ी जीत बताया, लेकिन साथ ही प्रशासन को खुली चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और उसमें आदिवासी संगठन के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। दोषी अधिकारियों पर तुरंत FIR दर्ज हो, उन्हें बर्खास्त किया जाए और आदिवासियों पर लगाए गए कथित झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं।
संगठन ने साफ शब्दों में कहा है कि यह सिर्फ 5 दिन का “सीजफायर” है। अगर तय समय में न्याय नहीं मिला तो पूरे मध्यप्रदेश से आदिवासी समाज नर्मदापुरम पहुंचेगा और बड़ा आंदोलन किया जाएगा। अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।

