भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस संगठन इन दिनों सुस्ती और अनिश्चितता के दौर से गुजरता नजर आ रहा है। पिछले कई महीनों से पार्टी के कई महत्वपूर्ण अभियान शुरू नहीं हो पाए हैं, जबकि संगठनात्मक नियुक्तियों पर भी फैसला अटका हुआ है। हालात ऐसे हैं कि पार्टी का मीडिया विभाग भी लंबे समय से बिना प्रवक्ताओं के काम कर रहा है, जिससे संगठन की गतिविधियों और संदेशों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाने में मुश्किलें सामने आ रही हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल के घटनाक्रमों और आंतरिक विवादों का असर पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक गतिविधियों पर साफ दिखाई दे रहा है। कई योजनाएं तैयार होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन शुरू नहीं हो सका है। इससे कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
बताया जा रहा है कि पार्टी ने घर-घर पहुंचने और आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान की योजना बनाई थी। इसके तहत हजारों परिवारों तक पहुंचकर जनसंपर्क बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि योजना तैयार होने के बावजूद यह अभियान अभी तक शुरू नहीं हो सका है।
इसी तरह ब्लॉक स्तर पर आयोजित होने वाले जनसंवाद सम्मेलन भी तय समय पर शुरू नहीं हो पाए। पार्टी नेतृत्व की ओर से इन कार्यक्रमों के जरिए कार्यकर्ताओं और जनता के बीच संवाद बढ़ाने की रणनीति बनाई गई थी, लेकिन अब तक अधिकांश कार्यक्रम कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
वहीं पार्टी का मीडिया विभाग भी पिछले करीब पांच महीनों से बिना नियमित प्रवक्ताओं के संचालित हो रहा है। नए प्रवक्ताओं की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है, लेकिन अब तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। इसके चलते कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया और मीडिया प्रबंधन प्रभावित होने की बात कही जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन को मजबूत करने और आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए कांग्रेस को जल्द ही लंबित नियुक्तियों और अभियानों पर फैसला लेना होगा। फिलहाल पार्टी के कार्यकर्ता और नेता संगठनात्मक गतिविधियों में तेजी आने का इंतजार कर रहे हैं।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि कांग्रेस नेतृत्व कब लंबित फैसलों को अंतिम रूप देता है और रुके हुए अभियानों को दोबारा शुरू कर संगठन में नई ऊर्जा भरने की कोशिश करता है।

