नर्मदा घाटी में कुषाण कालीन गणेश प्रतिमाओं के साक्ष्य! संग्रहालय में संरक्षित हैं चार दुर्लभ मूर्तियां

नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में नर्मदा घाटी की ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत में भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं खास महत्व रखती हैं। जिला पुरातत्व संग्रहालय नर्मदापुरम में संरक्षित चार दुर्लभ गणेश प्रतिमाएं इस बात का प्रमाण मानी जाती हैं कि नर्मदांचल में कुषाण काल से ही गणेश पूजन की परंपरा मौजूद रही है।

इतिहासकार हंसा व्यास के अनुसार नर्मदापुरम और सोहागपुर क्षेत्र से प्राप्त इन चारों प्रतिमाओं में भगवान गणेश का चतुर्भुजी स्वरूप दिखाई देता है। इनमें कुछ प्रतिमाएं नृत्य मुद्रा में हैं, जबकि कुछ में चक्ररूप के साथ हाथों में मोदक, त्रिशूल और सर्प जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं। कई प्रतिमाओं में भगवान गणेश के वाहन मूषक को भी स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है।

इन प्राचीन मूर्तियों को लाल और सफेद बलुआ पत्थर के साथ-साथ काले चिकने पत्थर से तराशा गया है। इनकी बारीक नक्काशी और शिल्पकला उस दौर के कलाकारों की अद्भुत कला का परिचय देती है। इतिहासकारों के मुताबिक पांचवीं और छठवीं शताब्दी के दौरान गुप्त, शुंग, सातवाहन, वाकाटक और राजपूत शासकों के दौर में शैव धर्म के प्रभाव के कारण शिव परिवार के साथ गणेश प्रतिमाओं का भी व्यापक निर्माण हुआ।

हंसा व्यास के अनुसार नर्मदा घाटी से लेकर चंबल घाटी तक की प्राचीन मूर्तिकला में भी एक खास समानता देखने को मिलती है। मंदसौर के हिंगलाजगढ़ और भोजपुर जैसे क्षेत्रों में मिली मूर्तियों में भी शिल्प की समानता नजर आती है। खास बात यह है कि उस दौर में आधुनिक मापदंड और मशीनें नहीं थीं। शिल्पकार छैनी और हथौड़ी जैसे साधारण औजारों से इन प्रतिमाओं को तैयार करते थे, इसके बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में बनी प्रतिमाओं में दिखाई देने वाली समानता आज भी शोध का विषय बनी हुई है।

भगवान गणेश की पूजा का इतिहास सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गणेश उत्सव का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में मुंबई में हुए दंगों के बाद समाज को एकजुट करने और अंग्रेजी शासन के प्रतिबंधों से बचने के उद्देश्य से गणेश उत्सव को सार्वजनिक और राष्ट्रीय स्वरूप देने की पहल की थी।

नर्मदापुरम में भी महाराष्ट्र की सीमा के करीब होने के कारण करीब 1920 के आसपास सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत होने की बात सामने आती है। शहर के गोल घाट यानी काले महादेव में सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा स्थापित होने की जानकारी दी जाती है। वहीं हलवाई चौक, सराफा चौक और इतवारा बाजार में पुराने गणेश पंडाल सजाने की परंपरा आज भी जारी है।

यानी नर्मदापुरम में गणेश उत्सव सिर्फ आस्था का पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पुरातात्विक विरासत और करीब एक सदी पुरानी सामाजिक परंपरा का भी हिस्सा है। संग्रहालय में सुरक्षित ये दुर्लभ प्रतिमाएं आज भी नर्मदा घाटी के समृद्ध इतिहास और प्राचीन शिल्पकला की कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं।

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