शहडोल। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाल तस्वीर सामने आई है, जहां मरीजों का इलाज करने वाला टीबी अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर नजर आ रहा है। अस्पताल की दीवारों में पेड़ उग आए हैं, चारों तरफ गंदगी और कचरे का अंबार लगा है, जबकि जर्जर होती इमारत किसी खंडहर जैसी दिखाई देती है। हालत इतनी खराब है कि दूर-दराज से इलाज के लिए आने वाले मरीजों को अस्पताल में अक्सर ताला लटका मिलता है और डॉक्टरों के समय पर नहीं पहुंचने से मरीज बिना इलाज और दवा के मायूस होकर वापस लौटने को मजबूर हो रहे हैं।
ब्यौहारी क्षेत्र के कल्लेव गांव से करीब 110 किलोमीटर का सफर तय कर कलावती पटेल अपने पति कुलदीप पटेल की टीबी की दवा लेने अस्पताल पहुंचीं, लेकिन अस्पताल बंद मिला। डॉक्टर नहीं मिलने पर उन्हें बिना इलाज लौटना पड़ा। वहीं कल्याणपुर की जीएनएम छात्रा अहिल्या सिंह भी टीबी जांच रिपोर्ट लेने अस्पताल पहुंचीं, लेकिन अस्पताल में ताला लगा होने के कारण उन्हें भी निराश लौटना पड़ा। इसी तरह जयसिंहनगर के रमतोरा गांव से करीब 80 किलोमीटर दूर से शिव नारायण सिंह टीबी जांच के लिए सैंपल लेकर पहुंचे थे, लेकिन अस्पताल बंद देखकर उन्हें भी वापस लौटना पड़ा।
मरीजों का आरोप है कि अस्पताल में अक्सर यही स्थिति बनी रहती है, जिससे गरीब और ग्रामीण लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। टीबी जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए बनाए गए इस अस्पताल की हालत अब स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। हालांकि शहडोल CMHO डॉ. राजेश मिश्रा का कहना है कि अस्पताल समय पर खुलता है और टीबी जांच नियमित रूप से की जा रही है। उन्होंने माना कि अस्पताल का भवन काफी पुराना हो चुका है और नए भवन के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

